Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
हार्दे तु तमसि क्षीणे स्वालोको जायते मुने ।
हार्दान्धकारक्षयदं परिज्ञातं विमुक्तिदम् ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मन्, प्रयत्नपूर्वक प्राणरूपी सूर्य
का अवलोकन करना चाहिए, यही हृदयगत अज्ञानान्धकार का विनाश करता है, परितः ज्ञात हुआ
उत्तम मुक्ति प्रदान करता है और इसका उदय एवं अस्त भी होता है यानी अज्ञानियों की दृष्टि में इसका
अस्त है तथा ज्ञानियों की दृष्टि में उदय है