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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 67

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, verse 67 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 67

संस्कृत श्लोक

आलोकालोकनं पुण्यं सर्वपावनपावनम् । न च भावनमन्नूनं तच्चित्तत्त्वमुपास्महे ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन्‌, जो सूर्य आदि समस्त अवभासक पदार्थो का भी अवभासक है, जो समस्त पावन पदार्थो में पावनतम पुण्यरूप है, जो मन, बुद्धि आदि के विकारों से तनिक भी अपने वास्तव स्वभाव से च्युत नहीं होता, उस चित्तत्त्व की हम उपासना करते हैं