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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 52

इक्यावनर्वौँ सर्ग समाप्त बावनवाँ सर्ग गुहा में आसनस्थित, समाधि में प्रवेश करने की इच्छावाले मुनि द्वारा चिन्तित चित्त प्रबोधन के उपायों का वर्णन |

63 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीराममचन्द्रजी, जैसे भ्रमर बहुत प्रकार के भ्रमण से मिले हुए…
  2. Verse 2जैसे सृष्टि-रचना से वैराग्य होने पर सत्यलोक में स्थित अपराजिता नाम की अथवा भगवन्नाभिकमल र…
  3. Verse 3(०३) वहाँ पर उन्होंने जैसे इन्द्र मेघ को जिसके मध्य में बिजलियाँ स्वगुच्छ के समान फैली रह…
  4. Verse 4जैसे सुमेरु नील रत्नमय अपने तट पर आकाश को, जिसमें तारे ही बहुमूल्य रत्न हैं, बिछाता है वै…
  5. Verse 5जैसे मेघ वृष्टि से अपने जाड्य का (जलता का) त्याग कर सफेद और गर्जन रहित होकर पर्वत के शिखर…
  6. Verse 6प्रबुद्ध (ज्ञानी) कपिल आदि के समान दृढ़ सिद्धासन (४६) बाँधकर एड़ी से वृषणों को (अण्डकोशों…
  7. Verse 7समीप में (विषयों में) दौड़े हुए मनरूपी मृग को वासनाओं से हटाकर उन्होने निर्विकल्प समाधि क…
  8. Verse 8अरे मूर्ख मन, तुम्हारा संसार वृत्तियों से क्या मतलब है? बुद्धिमान्‌ लोग अवसान मेँ (अंत मे…
  9. Verse 9जो शान्तिरूपी रसायन का त्यागकर विषय भोगों की ओर दौड़ता है, वह मन्दार वन का त्याग कर विष व…
  10. Verse 10चाहे तुम पाताल में जाओ चाहे ब्रह्मलोक में भी चले जाओ, किन्तु शम रूपी अमृत के बिना उस निरत…
  11. Verse 11हे मन, तुम सैकड़ों भोग आशाओं से पूर्ण होने पर पूर्वोक्त रीति से सब दुःख देते हो । अब तुम…
  12. Verse 12भाव (इष्ट वस्तु का सम्पादन) ओर अभावमय (अनिष्ट का निवारण) ये विचित्र विषय तुम्हारे उत्कट द…
  13. Verse 13हे मूर्ख चित्त, मेढकी जैसे मेघ में शब्दादिक व्यर्थ वृत्तियों से भ्रमण करती हे वैसे ही तुम…
  14. Verse 14हे मनरूपी मेढकी, जरा बतला तो सही, इतने समय तक व्यर्थ भुवन में (मेढ की के पक्ष में जल में)…
  15. Verse 15हे चित्त, जिससे मन और वाणी का अगोचर विदेह केवल्य सुख तुम्हें मिले, जिसमें तुम्हें जीवन्मु…
  16. Verse 16शब्द आदि विषय दुःख के लिए ही है ऐसा जो पूर्व में कहा है, उनमें से प्रत्येक का दृष्टान्तो…
  17. Verse 17हे मूर्ख मन, उस स्पर्शोन्मुखता से (स्परशर्हि सुखानुभव की इच्छा से) केवल दुःख के लिए त्वगइ…
  18. Verse 18अरे अन्धे मन, दुष्ट अन्नो की अभिलाषा से रसनेन्द्रियता को प्राप्त होकर बंसी में वधे हुए मा…
  19. Verse 19हे मूढ, तू कान्ता सम्बन्धी नाना प्रकार के रूपों में तत्पर चक्षुरिन्द्रियता के प्राप्त होक…
  20. Verse 20गन्ध के अनुभव की इच्छा से प्राणेन्द्रियता का आश्रय लेकर हाथी द्वारा मसले गये कमल के अन्दर…
  21. Verse 21अरे मूर्ख ! मृग, भँवरा, पतंगे, हाथी ओर मत्स्य एक -एक शब्द आदि विषय से विनष्ट हुए यानी मृग…
  22. Verse 22हे चित्त, जैसे क्षुद्र रेशम का कीड़ा अपने स्वाभाविक लार के फेन का अपने बन्धन के लिए कोशरू…
  23. Verse 23तव प्रमाद से प्राप्त हुए इस बन्धन पर कैसे विजय प्राप्त हो सकती है ? ऐसा कोई पूछे, तो इस प…
  24. Verse 24सारे वक्तव्य का संकलन कर एक उक्ति से कहते हैं। यदि तुम जगत्‌-प्रवृत्ति को जन्म तथा मरणकी…
  25. Verse 25अथवा अपने वैरी चित्त को उपदेश नहीं देना चाहिए, किन्तु जबरदस्ती उसे बाँध कर विचार द्वारा उ…
  26. Verses 26–28अथवा चित्त के उच्छेद के लिए पृथक्‌ प्रयत्न करने की भी आवश्यकता नहीं है क्योकि वह मूलअज्ञा…
  27. Verse 29अविवेकी का चित्त उपदेश के अयोग्य ही है, किन्तु विवेकी का चित्त भी चाहे वह नष्ट हो रहा हो…
  28. Verse 30उक्त का ही अनुवाद द्वारा उपसंहार करते हैं। चूँकि तुम दिन पर दिन क्षीण हो रहे हो, इसलिए क्…
  29. Verse 31अपना उससे असम्बन्ध देखना ही उसका त्याग है, इस आशय से कहते हैं। हे असन्मयचित्त, मैं अहंकार…
  30. Verses 32–33मुझसे कौन अपराध हुआ ? जिससे विनाश के लिए आप मेरा त्याग करते हैं, ऐसा यदि मन की ओर से प्रश…
  31. Verse 34जैसे हथिनी और हाथी की विल्व के अन्दर स्थिति नहीं हो सकती है वैसे ही अपरिच्छिन्न आत्मतत्व…
  32. Verse 35यह (देह) वह (आत्मा) मैं हूँ ऐसी भ्रान्ति की जो तुमने अहन्ता से कल्पना की है, वह अविचारशील…
  33. Verses 36–38“अहम” की नास्तिता को ही विचारकर विशद करते हैं। पैर के अँगूठे से लेकर सिर तक मैंने तिल-तिल…
  34. Verse 39यदि अहंपदार्थ है ही नहीं, तो तुम कौन हो ? ऐसा प्रश्न होने पर कहते है। तीनों जगता में जिसन…
  35. Verse 40विवेचन का प्रकार दिखलाते हैं। देह में यह मांस है, यह रक्त है, ये हड्डियाँ है, ये श्वासवाय…
  36. Verse 41स्पन्दनांश सारा का सारा प्राणवायुओं का है, ज्ञानांश परमात्मा का है, बुढापा ओर मरण देह के…
  37. Verse 42हे चित्त, मांस अहं पदार्थ से पृथक्‌ है, रक्त भी उससे अतिरिक्त है, हड्डियाँ भी 'अहम्‌” से…
  38. Verse 43यह नासिका हे, यह जिह्वा है, यह त्वचा है, ये दो कान हैं, यह चक्षु हे, यह स्पन्द है (कर्म क…
  39. Verses 44–45परमार्थरूप से विचार करने पर मन "अहम्‌" नहीं हे, तुम (चित्त) ˆअहम्‌“ नहीं हो, वासना भी 'अह…
  40. Verse 46उक्त आत्मा में यदि अध्यारोप दृष्टि हो, तो मैं ही सर्वत्र अधिष्ठान हूँ, इसलिए सब कुछ मैं ह…
  41. Verse 47बड़े सौभाग्य का विषय है कि अब मैं अज्ञानरूपी चोर को पहचान गया हूँ। अपने वास्तविक स्वरूपरू…
  42. Verse 48परस्पर विरोधी स्वभाववाले हम दोनों का कोई सम्बन्ध भी नहीं है, एकता की बातें तो दूर रही, इस…
  43. Verse 49यदि तुममे अहंकार आदि सर्वथा नहीं है, तो तुम वचन आदि से कैसे व्यवहार करते हो ? ऐसी शंका हो…
  44. Verse 50मुझे इसका पूरा निश्चय है कि वास्तव में ये चक्षु आदि मैं ही हूँ। यदि ये मुझसे भिन्न हैं, त…
  45. Verse 51बड़े खेद की बात है, जगत्रूपी बालक का वेतालरूपी तथा ताड के पेड़ से भी लम्बी और अनूठी आकृति…
  46. Verse 52अब अपनी पूर्वावस्था की अविचारदशा के लिए शोक करते हैं। जैसे तृण-हीन खराब पर्वत में हरिण दी…
  47. Verse 53अब प्रत्येक इन्द्रिय के विषय से सम्बद्ध अह प्रतीति के भाजन का अन्वेषण करते हैं । यदि चक्ष…
  48. Verse 54यदि त्वचा अपने विषय में स्पर्श के लिए तत्पर हुई, तो यह “अहम्‌” नामक दुष्ट पिशाच के तुल्य…
  49. Verse 55रसनेन्द्रिय के अपने विषय रसो में प्रवृत्त होने पर मैं मीठा भोजन करनेवाला हूँ, इस प्रकार क…
  50. Verse 56श्रवणतृष्णा से विवश बेचारी श्रोत्रेन्द्रियाँ के शब्दरूप विषय को प्राप्त होने पर निर्बीज अ…
  51. Verse 57अपनी नासिका की अभिलाषावश अपने गन्ध को प्राप्त होने पर मैं सूँघनेवाला हूँ” ऐसे जिसे अभिमान…
  52. Verse 58पूर्वोक्त स्थलों में प्रसिद्ध यह अहन्ता की कल्पना मृगतृष्णा के समान व्यर्थ होती है। उस अह…
  53. Verse 59यदि कोई कहे कि वासना के अभाव में बाहरी प्रवृत्तियाँ सर्वथा विरत हो जायेगी, इसलिए पुरुष का…
  54. Verses 60–61मोह, भय, विषाद, चिन्ता, उद्वेग आदि सब संतापों की शान्ति ही इसका गुण है, यह भाव है
  55. Verse 62अब इन्द्रियो को सम्बोधित कर इस अर्थ का विचारपूर्वक उन्हें उपदेश देते हैं। इसलिए हे मूर्ख…
  56. Verse 63अतएव विद्वानों की वासना आदि सब दृष्टियाँ अज्ञान से बाधित होकर अपने कार्य राग आदि के साथ श…
  57. Verse 64अतएव अज्ञानियों ने तृष्णा से ही इन्द्रियों का विनाश किया है, ऐसा कहते हैं। हे इन्द्रियरूप…
  58. Verse 65जैसे पर्वत के पथिक पर्वत के शिखर पर जाते-जाते पित्तवश घूम रही दृष्टि से गिरकर विषम गर्तमय…
  59. Verse 66जैसे छेदे हुए मनकों में (मनियों में) गुँथी हुई दीर्घ डोरी मोतियों के बन्धन में कारण होती…
  60. Verse 67एकमात्र भ्रान्ति से बनाई हुई यह (वासना) वस्तुतः सत्य नहीं है। हँसिये से पत्तों के समान एक…
  61. Verse 68जैसे वायु का झोंका दीपकों के तथा चमक रहे उल्का, बिजली आदि तेजो के विनाश के लिए होता है वै…
  62. Verse 69इस कारण सब इन्द्रियों के कोश केतुल्य आधारभूत हे चित्त, तुम सब इन्द्रियों के साथ ऐकमत्य को…
  63. Verse 70हे चित्त, सकल शास्त्रतत्त्वज्ञाताओं के अभिमत द्वैत वासना परिहाररूप (अभिमत विषयत्यागरूप) म…