Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verses 44–45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, verses 44–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
यथाभूततया नाहं मनो न त्वं न वासना ।
आत्मा शुद्धचिदाभासः केवलोऽयं विजृम्भते ॥ ४४ ॥
अहमेवेह सर्वत्र नाहं किंचिदपीह वा ।
इत्येव सन्मयी दृष्टिर्नेतरो विद्यते क्रमः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
परमार्थरूप से विचार
करने पर मन "अहम्" नहीं हे, तुम (चित्त) ˆअहम्“ नहीं हो, वासना भी 'अहम्' नहीं हे । शुद्ध चित्प्रकाश
यह आत्मा तो अहन्ता से रहित ही विलसित होता है यानी आत्मा तो अहन्ता से सर्वथा अस्पृष्ट है, यह
भाव है