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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 59

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, verse 59 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 59

संस्कृत श्लोक

वासनाहीनमप्येतच्चक्षुरादीन्द्रियैः स्वतः । प्रवर्तते बहिः स्वार्थे वासना नात्र कारणम् ॥ ५९ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि वासना के अभाव में बाहरी प्रवृत्तियाँ सर्वथा विरत हो जायेगी, इसलिए पुरुष का जीवन ही न रहेगा, तो उस पर कहते हैं। यह शरीर वासनाहीन होने पर भी अपने जीवन के हेतु कर्म में चक्षु आदि इन्द्रियों द्वारा स्वतः बाहर प्रवृत्त होता है । इस प्रवृत्ति में वासना कारण नहीं है दाम, व्याल ओर कट की, जो वासनारहित थे, पहले युद्धादि प्रवृत्तियों का वर्णन किया जा चुका है