Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
चिरमज्ञानधूर्तेन पोथितोऽस्मि त्वहंतया ।
वृकेण दृप्तेनाटव्यां लब्धेन पशुपोतकः ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त आत्मा में यदि अध्यारोप दृष्टि हो, तो मैं ही सर्वत्र अधिष्ठान हूँ, इसलिए सब कुछ
मैं ही हूँ अथवा यदि अपवाद दृष्टि हो, तो यहाँ मैं कुछ भी नहीं हूँ, ऐसी जो दृष्टि है वही वास्तविक हे ।
एक देहमात्र में सीमित अहंभावरूप दूसरा अहंकार क्रम नहीं है । भाव यह कि इस जगत् मेँ सर्वत्र
प्रतीयमान मैं ही हूँ अथवा यहाँ पर प्रतीयमान कुछ भी मैं नहीं हूँ, ऐसी जो दृष्टि है, वही वास्तविक है।
दूसरा परिच्छिन्न विषय में अहंप्रतीतिरूप क्रम वास्तविक नहीं है ॥ ४ ५॥ अज्ञानरूपी धूर्त ने वंचना द्वारा
स्वरूपवियोग से चिरकाल तक ऐसे ही मुझे क्लेश पहुँचाया जैसे कि मस्त भेड़िया जंगल में मृग के बच्चे
को क्लेश पहुँचाता है