Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verses 36–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, verses 36–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
पादाङ्गुष्ठाच्छिरो यावत्कणशः प्रविचारितम् ।
न लब्धोऽसावहं नाम कः स्यादहमिति स्थितः ॥ ३६ ॥
भरिताशेषदिक्कुञ्जं यत्स्यामेकं जगत्त्रये ।
संवेदनमसंवेद्यं सर्वत्रविगतात्मकम् ॥ ३७ ॥
दृश्यते यस्य नेयत्ता न नाम परिकल्पना ।
नैकता नान्यतैवेह न महत्ता न चाणुता ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
“अहम” की नास्तिता को ही विचारकर विशद करते हैं।
पैर के अँगूठे से लेकर सिर तक मैंने तिल-तिल पर विचार किया। यह “अहम् नाम का पदार्थ मुझे
नहीं मिला । “अहम्” रूप से स्थित कौन होगा ?