Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
महाश्वभ्रीव गम्भीरा दुःखदा वासनाश्रिता ।
त्वयैषा बत चित्तेति नैनामनुसराम्यहम् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे हथिनी और हाथी की विल्व के अन्दर स्थिति नहीं हो सकती है वैसे ही अपरिच्छिन्न
आत्मतत्व की इस प्रकार के परिच्छिन्न मन के अन्दर परिच्छिन्न स्थिति (देहआदि में अहंकार भाव से
स्थिति) नहीं हो सकती है ॥३ ३॥
चित्त की त्याज्यता में दूसरा भी हेतु कहते हैं।
हे चित्त, खेद की बात है कि तुमने बड़े भारी जीर्ण कुएँ आदि के समान अगाध तथा काम, क्रोध,
लोभ आदिरूप साँप, बिच्छू, पिशाचआदि के निवासभूत होने के कारण दुःखदायी इस वासना को ही
अपने निवासस्थान के रूप में अपनाया है, किन्तु मैं तो इसका अनुसरण नहीं करता हूँ । इसलिए उसके
अनुगामी तुम्हारा त्याग करता हूँ, यह भाव है