Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
कुरङ्गालिपतङ्गेभमीनास्त्वेकैकशो हताः ।
सर्वैर्युक्तैरनर्थैस्तु व्याप्तस्याज्ञ कुतः सुखम् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
अरे मूर्ख ! मृग, भँवरा, पतंगे, हाथी ओर मत्स्य एक -एक शब्द आदि
विषय से विनष्ट हुए यानी मृग एकमात्र शब्द से, भँवरे एकमात्र गन्ध से, पतंगे एकमात्र रूप से, हाथी
एकमात्र स्पर्श से ओर मछलियाँ एकमात्र रस से विनष्ट हुई; संमिलित सब अनर्थ से व्याप्त हुए तुम्हें
कहाँ से सुख हो सकता है ?