Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 63
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, verse 63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
वासनाद्या दृशः सर्वा व्यतिरिक्तास्तु नात्मनः ।
जलादिव तरङ्गाद्या ज्ञस्यैवान्यस्य नानघ ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव विद्वानों की वासना आदि सब दृष्टियाँ अज्ञान से बाधित होकर अपने कार्य राग आदि के
साथ शुद्धात्मा ही हो गई, इसलिए उनका पृथक् अस्तित्व नहीं है, ऐसा कहते हैं।
हे निष्पाप, ज्ञानी की ही दृष्टि में जैसे तरंग, बुदबुदे, फेन आदि जल से पृथक् नहीं हैं वैसे ही वासना
आदि सब दृष्टियाँ आत्मा से पृथक् नहीं हैं। अज्ञानी की दृष्ट में तो उनकी पृथक् सत्ता है