Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 66
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, verse 66 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 66
संस्कृत श्लोक
वासनैवेह भवतां हेतुरेकत्र बन्धने ।
रज्जुः शून्याशयप्रोता मुक्तानामातता यथा ॥ ६६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
छेदे हुए मनकों में (मनियों में) गुँथी हुई दीर्घ डोरी मोतियों के बन्धन में कारण होती है वैसे ही आप
लोगों के एक जगह बन्धन में वासना ही हेतु है