Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
स तत्प्रस्तारयामास पृष्ठे चारु मृगाजिनम् ।
नीलरत्नतटे मेरुस्तारासारमिवाम्बरम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सुमेरु नील रत्नमय अपने तट पर आकाश को, जिसमें तारे ही बहुमूल्य
रत्न हैं, बिछाता है वैसे ही उन्होने उस आसन के ऊपर सुन्दर मृगचर्म बिछाया