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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 122

एक सौ इक्कीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ बाईसवाँ सर्ग पहले पुरुष का ज्ञानभूमिका के उदयक्रम का वर्णन तदनन्तर शोक, मोह आदि के निराकरण द्वारा श्रीरामचन्द्रजी का बोधन ।

48 verse-groups

  1. Verse 1पहले उत्पन्न हुए कुछ विकसित बुद्धिवाले यानी इस जन्म में या जन्मान्तर में किये गये कर्मो स…
  2. Verse 2अनवरत प्रवाह में पड़ा हुआ यह अविद्यारूपी नदियों का समूह शास्त्र और सज्जन (संतजन) के संसर्…
  3. Verse 3उससे विवेकपूर्वक पुरूष को यह हेय है ओर यह उपादेय है, यह विचार उत्पन्न होता है
  4. Verse 4तब वह पूर्वोक्त शुभेच्छा नाम की ज्ञानभूमिका में अवतीर्ण होता है
  5. Verse 5शुभेच्छा नाम की ज्ञानभूमिका में विजय प्राप्त करने से दूसरी भूमिका की प्राप्ति दशाति हैं ।…
  6. Verse 6दूसरी भूमिका के विजय से तीसरी भूमिका मे अवतरण होता है, ऐसा कहते हैं । सम्यग्‌ ज्ञान से अस…
  7. Verse 7उसके द्वारा तनुमानसा नाम की तीसरी ज्ञानभूमिका में अवतीर्ण होता है
  8. Verse 8चौथी भूमिका के अवतरण का प्रकार कहते हैं। जभी योगी के सम्यग्‌ ज्ञान का उदय होता है, तभी शु…
  9. Verse 9उसके कारण जब वासना सूक्ष्मता को प्राप्त हो जाती है, तभी योगी असंसक्त कहा जाता है, कर्मफल…
  10. Verse 10तदनन्तर वासनाओं के तनु होने के कारण पुरुष सदा ही अन्तर्मुखरूप रहने से ब्रह्माहंभाव की वास…
  11. Verse 11कितने काल तक भावना की तनुताका अभ्यास करना चाहिए, इस प्रश्न पर कहते हैं। जब तक समाधिस्थ हो…
  12. Verse 12अत्यन्त सूक्ष्म ब्रह्म में जिसने अपने चित्त को एकरस कर दिया है, ऐसा योगी उसके द्वारा पदार…
  13. Verse 13पूर्वोक्त प्रकार से ब्रह्म में जिसका चित्त लीन हो गया है, ऐसा योगी कुछ वर्षों तक अभ्यास क…
  14. Verse 14यद्यपि पूर्व की भूमिकाओं में भी जिन्होंने ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया है, वे जीवन्मुक्त…
  15. Verse 15आप तो अत्यन्त शुद्ध चित्तवाले हैं, इसलिए आपने दूसरी भूमिका में ही अपने ही विचार से प्रत्य…
  16. Verse 16चाहे आप सदा ही समाधिस्थ रहे, चाहे लोकव्यवहार करते रहें, आप शोक अथवा हर्ष को प्राप्त न हों…
  17. Verse 17हे श्रीरामचन्द्रजी, स्वयंप्रकाश, निर्मल, सर्वव्यापक, अविनाशी आत्मरूप आपमें सुख और दुःख का…
  18. Verse 18यदि कोई शंका करे, आत्मबोध से जन्म-मरण आदि से होनेवाले शोक पर भले ही विजय प्राप्त हो जाय,…
  19. Verse 19आप बन्धुओं की देह को शोक के योग्य कहते हैं अथवा आत्मा को ? पहला पक्ष नहीं बन सकता, क्योंक…
  20. Verse 20आप अविनाशी हँ फिर भी मैं विनष्ट होऊँगा, इस प्रकार शोक क्यों करते हैं ? आत्मा मृत्यु का नि…
  21. Verse 21जैसे घट के फूटकर टुकड़े होने पर घटाकाश का विनाश नहीं होता, वैसे ही इस शरीर के नष्ट होने प…
  22. Verse 22जैसे सूर्य की किरणों पर प्रतीत हो रही मृगतृष्णा रूपी नदी के नष्ट होने पर धूप नष्ट नहीं हो…
  23. Verse 23व्यर्थ भ्रान्तिरूप पदार्थों की इच्छा ही आपके हृदय में क्यों उदित होती है ? आत्मा अद्वितीय…
  24. Verse 24हे श्रीरामचन्द्रजी, इस जगत्‌ में सर्वशक्ति परमात्मा में ही ये सब शक्तियाँ स्थित हे । ऐसी…
  25. Verse 25यदि कोई शंका करे, जैसे धूप मे मृगतृष्णा भ्रम की शक्तियाँ हैं, वैसे ही यदि ब्रह्म मे जगत्‌…
  26. Verse 26अत्यन्त असत्‌ जगत्‌ के उदय मे क्या बीज है ? ऐसी यदि कोड शंका करे, तो जगत्‌ की उत्पत्ति मे…
  27. Verse 27चूँकि यह चित्त से उत्पन्न हुई है, इसलिए चित्त के क्षय से ही इसका क्षय होता है, ऐसा कहते ह…
  28. Verse 28संसाररूपी विशाल चाक के बीच में स्थित कील पर आरूढ़ तिरछे काट में लगी हुई, ऊपर और नीचे के च…
  29. Verse 29जब तक इस माया का ज्ञान नहीं होता, तब तक यह बड़े-बड़े मोहों को देती है। जब इसका ज्ञान हो ज…
  30. Verses 30–33यहाँ पर संसार का भोग करके अपनी लीलाभूत ब्रह्मविद्या से ब्रह्म का स्मरण कर ब्रह्म से आई हु…
  31. Verses 34–38हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे तेज से प्रकाश उत्पन्न होता है, वैसे ही कल्याणमय, रूपरहित, अप्रमे…
  32. Verse 39हर्ष और शोक से रहित ऐसा जो पहले कहा, उसका उपपादन करने के लिए कहते है । आकाश के समान अत्यन…
  33. Verses 40–41जैसे दुर्बुद्धि मूर्ख पुरुष विकल्पों से अभिभूत होता है, वैसे ही देहरहित आप देह से उत्पन्न…
  34. Verses 42–43देह के नष्ट होने पर अखण्ड चैतन्यरूप अज्ञानी का भी विनाश नहीं होता । आप तो ज्ञानी हैं, आपक…
  35. Verse 44अब असंसारी आत्मा को दशनि के लिए चित्त को भी देहकोटि में रखकर देह को ही प्रिय ओर अप्रिय का…
  36. Verse 45मन के अगोचर होने के कारण जो यह चिदात्मा शून्य की तरह स्थित हे, वह सुख ओर दुःखों से व्याप्…
  37. Verse 46यदि कोई शंका करे कि देह के नष्ट होने पर जीव कहाँ जाता है 2 तो इस पर कहते है । जैसे भ्रमर…
  38. Verse 47यदि आप शंका करे कि यदि जीव प्रतिबिम्ब है, तो उसकी उपाधि से अतिरिक्त सत्ता न होने से वह अस…
  39. Verse 48वस्तुतः प्रतिबिम्ब बिम्ब ही है, क्योंकि उपाधि में प्रवेश रूप भेद की कल्पना से विम्ब की ही…
  40. Verses 49–50यदि कोई शंका हो कि यदि उसमें इच्छा नहीं है, तो इच्छा के बिना उसकी सृष्टि की सिद्धि कैसे ह…
  41. Verses 51–52जैसे दर्पण और बिम्ब का सम्बन्ध इच्छा न होने पर भी होता है वैसे ही आत्मा और जगत्‌ का भेदाभ…
  42. Verse 53हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार के हमारे उपदेश से इस जगत्‌ की स्थिति का मूर्ताकार निवृत्त ह…
  43. Verse 54जैसे दीपक की केवल सत्ता से प्रकाश स्वभावतः होता है वैसे ही चित्तत्त्व की केवल सत्ता से स्…
  44. Verse 55इस प्रकरण में जो अर्थ विस्तार से कहा है, उसको संक्षेप से दर्शीते हुए श्रीवसिष्ठजी प्रकरण…
  45. Verse 56इसलिए निमित्त का नाश होने पर नैमित्तिक का भी नाश होने से निर्मल एकमात्र आत्मा ही शेष रहता…
  46. Verse 57व्यष्टिभ्रमकल्पना की तरह समष्टिस्रष्टिकल्पना में भी आविभवि और तिरोभाव मन के ही अधीन हैं,…
  47. Verse 58इसलिए सम्पूर्ण दृश्य व्यष्टि-समष्टि भेद से कल्पित मनोमात्र ही है । मन अज्ञान कार्य होने स…
  48. Verse 6एक सौ बार्डसवाँ सर्ग समाप्त योगवासिष्ठभाषानुवाढ में उत्पत्ति प्रकरण समाप्त आदिकवि श्रीमद्…