Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
इत्यन्तर्लीनचित्तः कतिचित्संवत्सरानभ्यस्य सर्वथैव कुर्वन्नपि बाह्यपदार्थान्भावनां त्यजति तुर्यात्मा भवति ततो जीवन्मुक्त इत्युच्यते ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त
प्रकार से ब्रह्म में जिसका चित्त लीन हो गया है, ऐसा योगी कुछ वर्षों तक अभ्यास करके दूसरों
की इच्छा से कार्यानुसार कभी स्नान, भोजन आदि बाह्य क्रियाओं को करता हुआ भी उसकी
भावना को सर्वथा छोड़ देता है। स्वयं ही तुर्य आत्मा हो जाता है । छठी भूमिका तक चित्त की
ब्रह्माकारता के स्थिर होने पर कुछ न कुछ प्रयत्न की अनुवृत्ति रहती है, सातवीं भूमिका में तो
प्रयत्न की सर्वथा निवृत्ति होने से स्वाभाविक प्रतिष्ठा यानी ब्रह्मनिष्ठा हो जाती है, यह विशेष
है। वही पुरुष जीवन्मुक्त कहा जाता है