Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verses 42–43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, verses 42–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 42,43
संस्कृत श्लोक
आपतेदर्कमार्गेऽपि न निरुद्धगमागमम् ।
चित्तं नाम स विज्ञेयः पुरुषो न शरीरकम् ॥ ४२ ॥
शरीरे सत्यसति वा पुमानेव जगत्त्रये ।
ज्ञोऽप्यज्ञोऽपि स्थितो राम नष्टेदेहे न नश्यति ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
देह के नष्ट होने पर अखण्ड चैतन्यरूप अज्ञानी का
भी विनाश नहीं होता । आप तो ज्ञानी हैं, आपका कहना ही क्या हे २।४१॥
अज्ञानी का भी नाश नहीं होता, ऐसा जो पूर्व में कहा है उसके उपपादन के लिए देह से
अतिरिक्त चिदात्मा को सिद्ध करते हैं।
जो चित्त गमनागमन की स्वतन्त्रता होने से सर्वत्र जाता है, आलम्बनरहित सूर्य के मार्ग में
भी जिसके संचार का निरोध नहीं होता वह चित्त ही पुरुष (पुरि शेते इति पुरुषः) संसारी
आत्मा है, शरीर पुरुष नहीं हैं । हे श्रीरामचन्द्रजी, शरीर चाहे रहे या न रहे, तीनों लोको में
पुरुष ही- चाहे वह ज्ञानी हो या अज्ञानी स्थित रहता हे । शरीर के नष्ट होने पर उसका नाश
नहीं होता