Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
वाञ्छैवोदेति ते कस्माद्भ्रान्तिरन्तर्निरर्थिका ।
अद्वितीयो द्वितीयं किं यद्वस्त्वात्माभिवाञ्छतु ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
व्यर्थ भ्रान्तिरूप पदार्थों की इच्छा ही आपके हृदय में क्यों
उदित होती है ? आत्मा अद्वितीय है, ऐसी अवस्था में वह दूसरी किस किस वस्तु की अभिलाषा
करेगा ?