Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
चित्ताद्राघव रूढेयं त्रिलोकीललनोदिता ।
त्रिविधेन क्रमेणेह जन्मना जनितभ्रमा ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
अत्यन्त असत् जगत् के उदय मे क्या बीज है ? ऐसी यदि कोड शंका करे, तो जगत् की
उत्पत्ति में एकमात्र चित्त ही बीज है, उसीको कहते है ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, यह पूर्वोक्त त्रिलोकीरूपी ललना चित्त से ही उदित हुई है । इसने
सात्विक, राजस ओर तामस तीन प्रकार के जन्मों से संसार में भरम उत्पन्न कर रक्खा हे