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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 39

संस्कृत श्लोक

अदेहस्यैव ते राम निर्विकल्पचिदाकृतेः । लज्जाभयविषादेभ्यः कुतो मोहः समुत्थितः ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

हर्ष और शोक से रहित ऐसा जो पहले कहा, उसका उपपादन करने के लिए कहते है । आकाश के समान अत्यन्त स्वच्छ उस चिदात्मा में यह जगत्‌ भिन्न के तुल्य प्रतिबिम्बित होता हे । शुद्ध साक्षी के द्वारा उसका प्रिय ओर अप्रिय विभाग से विवेक नहीं हो सकता इसलिए प्रिय ओर अप्रिय के विभाग के विवेक के वास्ते उन दोनों से भिन्नरूप से मध्य में अन्तःकरण प्रतिबिम्बित होता है, वही प्रिय ओर अप्रिय के विकल्पों द्वारा मोह आदि जो भाव हैं, उन्हें प्राप्त होता हे । आत्मा लोभ, मोह आदि भावों को प्राप्त नहीं होता है । वे यानी जगत्‌, जगद्बुद्धि ओर जगद्बुद्धिप्रयुक्त लोभ, मोह आदि भेद के बिना ही उस चिदात्मा मेँ प्रतिबिम्बित है, इसलिए वे परमार्थतः परमात्मरूप ही हैं । जसे दर्पण से अपृथक्‌ दर्पण के अन्दर दिखाई दे रहे पर्वत, वन, नदी आदि हैं, वैसे ही परमात्मा में ये भी प्रतिबिम्बित हैं ॥३७.३८॥ ऐसी अवस्था में जिन मूढो को देह में आत्मबुद्धि है, उन्हीको भय, दुःख आदि होते हैं, आपको तो नहीं होने चाहिए, ऐसा कहते है । हे श्रीरामचन्द्रजी, आप तो देहरहित निर्विकल्प चिदाकाश हैं, इसलिए आपको लज्जा, भय, विषाद, आदि से मोह केसे उत्पन्न हुआ ?