Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
अपरिज्ञायमानैषा महामोहप्रदायिनी ।
परिज्ञाता त्वनन्ताख्या सुखदा ब्रह्मदायिनी ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
जब तक इस माया का ज्ञान नहीं होता, तब तक यह
बड़े-बड़े मोहों को देती है। जब इसका ज्ञान हो जाता है, तो इसका नाम भी अनन्त यानी ब्रह्म
हो जाता है, यह सुखदायिनी और ब्रह्मदायिनी हो जाती है