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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verses 51–52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, verses 51–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 51,52

संस्कृत श्लोक

अनिच्छमपि संबन्धो यथा दर्पणबिम्बयोः । तथैवेहात्मजगतोर्भेदाभेदौ व्यवस्थितौ ॥ ५१ ॥ सूर्यसंनिधिमात्रेण यथोदेति जगत्क्रिया । चित्सत्तामात्रकेणेदं जगन्निष्पद्यते तथा ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे दर्पण और बिम्ब का सम्बन्ध इच्छा न होने पर भी होता है वैसे ही आत्मा और जगत्‌ का भेदाभेद रूप सम्बन्ध इच्छा के बिना ही होता है यानी भानमात्र से भेदसम्बन्ध और यथार्थरूप से अभेद है । जैसे सूर्यके केवल उदय होनेसे जगत्‌ के कार्य होते हैं वैसे ही केवल चित्‌ की सत्ता से ही इस जगत्‌ की उत्पत्ति होती है