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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । प्रथमं जातमात्रेण पुंसा किंचिद्विकसितबुद्धिनैव सत्संगमपरेण भवितव्यम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

पहले उत्पन्न हुए कुछ विकसित बुद्धिवाले यानी इस जन्म में या जन्मान्तर में किये गये कर्मो से शुद्धचित्त हुए पुरुष को इस प्रकार सत्संग में तत्पर होना चाहिए

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ इक्कीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ बाईसवाँ सर्ग पहले पुरुष का ज्ञानभूमिका के उदयक्रम का वर्णन तदनन्तर शोक, मोह आदि के निराकरण द्वारा श्रीरामचन्द्रजी का बोधन ।