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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

सर्वशक्ताविमास्तस्मिन्नात्मन्येवाखिलाः स्थिताः । शक्तयो वितते व्यक्ते आकाश इव शून्यता ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे, जैसे धूप मे मृगतृष्णा भ्रम की शक्तियाँ हैं, वैसे ही यदि ब्रह्म मे जगत्‌ की शक्तियाँ है तो वे भिन्न होगी, इस पर कहते है । जैसे आकाश में शून्यता है यानी शून्यता आकाश से पृथक्‌ नहीं है, वैसे ही सर्वशक्तिमान्‌, व्यापक, व्यक्त आत्मा में ये सब शक्तियाँ हैं यानी उससे पृथक नहीं हैं