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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 55

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 55

संस्कृत श्लोक

पूर्वं मनः समुदितं परमात्मतत्त्वात्तेनाततं जगदिदं स्वविकल्पजालैः । शून्येन शून्यमपि तेन यथाम्बरेण नीलत्वमुल्लसितचारुतरामिधानम् ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकरण में जो अर्थ विस्तार से कहा है, उसको संक्षेप से दर्शीते हुए श्रीवसिष्ठजी प्रकरण का उपसंहार करते हैं । पहले परमात्मतत्त्व से मन उदित हुआ । उसने जैसे शून्य आकाश असत्‌ नीलताका, जिसका कि सब लोगों के अनुभव से अधोमुख किया हुआ मनोहर इन्द्रनीलमणि के कड़ाहे की तरह यह नील आकाश दीख रहा है, इस तरह उपमा और उत्प्रेक्षा द्वारा- सुन्दर वाग्‌व्यवहार होता है, विस्तार करता है, वैसे ही अपने विविध विल्कपों से इस जगत्‌ का विस्तार किया