Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 57
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, verse 57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
कर्मात्मकं प्रथममेव मनोऽभ्युदेति संकल्पतः कमलजप्रकृतीस्तदेत्य ।
नानाभिधं जगदिदं हिं मुधा तनोति वेतालदेहकलनामिव मुग्धबालः ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
व्यष्टिभ्रमकल्पना की तरह समष्टिस्रष्टिकल्पना में भी आविभवि और तिरोभाव मन के
ही अधीन हैं, ऐसा दशति हैं।
सब प्राणियों के कर्मो की समष्टिरूप और समष्टिकर्मशक्तिप्रधान मन पहले उत्पन्न होता
है । उसके बाद मन में चित् का प्रतिबिम्ब पड़ने से ब्रह्मा, मनु आदि रूप सृष्टिकर्ताओं के
शरीरो को स्वीकार करके वह संकल्पवश विविध प्रकार के इस जगत् की व्यर्थ ही सृष्टि करता
है, जैसे कि अज्ञानी बालक व्यर्थ वेताल के शरीर की कल्पना करता हे