Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verses 49–50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, verses 49–50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 49,50
संस्कृत श्लोक
साक्षिभूते समे स्वच्छे निर्विकल्पे चिदात्मनि ।
निरिच्छं प्रतिबिम्बन्ति जगन्ति मुकुरे यथा ॥ ४९ ॥
साक्षिभूते समे स्वच्छे निर्विकल्पे चिदात्मनि ।
स्वयं जगन्ति दृश्यन्ते सन्मणाविव रश्मयः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका हो कि यदि उसमें इच्छा नहीं है, तो इच्छा के बिना उसकी सृष्टि की सिद्धि
कैसे होगी ? तो इस पर कहते हैं।
सबके साक्षी सर्वत्र शम, निर्मल, निर्विकल्प, चिदात्मा में ये सब जगत् बिना किसी प्रकार
की इच्छा के ऐसे प्रतिबिम्बित होते हैं जैसे कि दर्पण में पर्वत, वन, नगर आदि । जैसे सुन्दर
मणि में किरण स्वयं दिखाई देती हैं वैसे ही सबके साक्षीभूत, सर्वत्र शम, निर्मल, निर्विकल्प
चिदात्मा में जगत् स्वयं दिखाई देते है