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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, Verse 48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 122, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 122 · श्लोक 48

संस्कृत श्लोक

सत्यं भावय तेन त्वं मा मोहमनुभावय । निरिच्छस्यात्मनो नेच्छा काचिदप्यनघाकृतेः ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

वस्तुतः प्रतिबिम्ब बिम्ब ही है, क्योंकि उपाधि में प्रवेश रूप भेद की कल्पना से विम्ब की ही प्रतिबिम्बरूप से प्रतीति होती है अन्यथा जड़ उपाधि का कार्य होने पर चिदाभास भी जड़ हो जायेगा, अत: संसार का भान नहीं होगा, इसलिए आप जीव को उसकी उपाधियों के परित्याग द्वारा सत्य ब्रह्म ही समझिये। भ्रान्ति से प्राप्त हुए नश्वर देह आदि भाव का अनुभव न कीजिये । पूर्ण ब्रह्मभाव से तृप्त होने के कारण इच्छारहित और निर्दोष आत्मा में कोई इच्छा नहीं है