Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 121
एक सौ बीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ इक्कीस सर्ग चण्डाली द्वारा उक्त वृतान्त को सुनकर विस्मित हुए राजा लवण के घर आ जाने पर वसिष्ठजी के कथन से उस वृत्तान्त का श्रीरामचन्द्रजी को विनिश्चय ।
56 verse-groups
- Verse 1चण्डाली ने कहा : हे राजन्, कुछ काल बीतने पर इस ग्राम में वृष्टि के न होने से अत्यन्त भयं…
- Verse 2इस महान् दुःख से ग्राम के सभी लोग निकलकर दूर चले गये तथा शेष सब लोग मर गये
- Verse 3हे प्रभो, हे सुन्दर, उस दुर्भिक्ष तथा बन्धुओं के मरण से इस वन में हम अभागिनिर्यो शून्य हो…
- Verse 4उस वृद्धा के मुख से यह सुनकर राजा अत्यन्त विस्मित हुए और मन्त्रियों के मुख को देखकर चित्र…
- Verse 5उस अपूर्वं आश्चर्य का राजा ने पुनः विचार किया, तदनन्तर बार-बार पूछा ओर इससे राजा को बड़ा…
- Verses 6–7लोक में ऊच, नीच आदि विविध भावों को देख चुके राजा लवण दया से पूर्ण हो गये, उन्होने समुचित…
- Verse 8प्रातःकाल उस राजा ने विस्मित होकर सभाभवन में मुझसे पूछा : हे मुने, यह स्वप्न मैंने प्रत्य…
- Verse 9संशय को इस तरह मिटा दिया जिस तरह वायु मेघ को आकाश से दूर करता हे
- Verse 10हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार यह अविद्या बड़ी भ्रम देनेवाली है, यह अतिशीघ्र पूर्ण रीति से…
- Verse 11श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्, कृपा कर यह बतलाइये कि यह स्वप्न कैसे सत्य अर्थात्…
- Verse 12श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इन सभी बातों का अविद्या में सम्भव हे, देखिये न,…
- Verse 13जैसे दर्पण के भीतर स्थित पर्वत दूर होता हुआ भी निकट प्रतीत होता है वैसे ही अत्यन्त दूर की…
- Verses 14–15जैसे स्वप्न मे अपना मरण प्रतीत होता है, वैसे ही अत्यन्त असम्भव भी संभव हो जाता हे । स्वप्…
- Verse 16वासनायुक्त चित्त पूर्णरूपसे जिस वस्तु की जैसी भावना करता है, उस वस्तु का वैसा ही शीघ्र अन…
- Verse 17अहन्त्व आदि रूप मिथ्या ज्ञान जिस समय उदय को प्राप्त हुआ, उसी समय आदि, मध्य तथा अन्त से ही…
- Verse 18सब पदार्थो का विपरिणाम मन के प्रतिभास से ही होता है, इसीलिए क्षण कल्पता को प्राप्त होता ह…
- Verse 19जिसकी मति विपरीत हो गई हे, वह प्राणी अपने को भेडा समझता है ओर वासना से भंडा भी अपने में स…
- Verse 20विषम भ्रम को देने वाले अविद्या, मोह, अहन्त्व आदि समान हैं, क्योकि ये सब चित्त के विपर्यसि…
- Verse 21यद्यपि सब पदार्थ अविद्या से कल्पित ही हैं तथापि उत्तर व्यवहार से पूर्व व्यवहार का संवाद ह…
- Verse 22राजा लवण के व्यवहार में किस रीति से संवाद हुआ; उसे कहते हैं। उस भीलों की टोली में पहले कि…
- Verse 23जिस तरह अनुभूत वस्तु की विस्मृति होती है उसी तरह अननुभूत वस्तु का स्मरण भी दोषावह नहीं है…
- Verse 24इसी प्रकार स्वप्न में देशान्तरगमन में प्राकृत पुरुष भी भोजन करने पर मैंने भोजन नहीं किया,…
- Verse 25प्रतिभास और संवाद का पूर्वापरभाव भी कल्पनामात्र है, अतः व्यवस्थित नहीं है, इस आशय से कहते…
- Verse 26अथवा राजा लवण ने जो स्वप्नभ्रम देखा था, वही भ्रम विन्ध्यपर्वत के चण्डालों के चित्त में सं…
- Verse 27प्रतिभा के भेद की कल्पना भी विचारसह नहीं है, क्योकि एक में उत्पन्न हुई प्रतिभा का दो में…
- Verses 28–31प्रतिभा और प्रतिभा के विषय के संवाद में द्ृष्टान्त कहते हैं। जैसे बहुत कवियों के मनों की…
- Verses 32–33क्या इस तरह का व्यवहार अत्यन्त असत् है ? इस शंका पर “नहीं ऐसा कहते हैं। उस व्यवहारदशा की…
- Verse 34सत् वस्तु के सम्बन्ध से वह वस्तु क्यो नहीं हैं ? इस पर कहते है । अत्यन्त असत् अविद्या क…
- Verse 35यदि सब पदार्थ चिन्मय ही मान लिये जायें तो चिद्रूप से तुल्य सव पदार्थों के साथ चित् का सम…
- Verse 36चित् के सम्बन्ध से पदार्थो का भान होता है, इस पक्षमे भी दोष कहते है । यदि जगत् के सभी प…
- Verses 37–38पूर्वोक्त दोनों प्रकारो को दो श्लोकोसे फिर स्पष्ट कहते है । अत्यन्त विषम पदार्थो का निरन्…
- Verse 39चिद्रूप से सदृश परमात्मरूप वस्तु में चिन्मयरूप से सदुश जगत्रूप वस्तु अणुमात्र भी भेदक अचि…
- Verse 40चित् और जड़ के भेदसम्बन्ध से भी उक्त अनुभव उत्पन्न नहीं हो सकता, इस आशय से कहते हैं। एक…
- Verse 41यदि कोई कहे कि जैसे जाडयरूप धर्म के कारण साम्य होने पर भी काठ, पत्थर, मिट्टी आदि का एक घर…
- Verses 42–44जलमय होने से सजातीय जिह्वा ओर रस से स्पष्ट उदित हुआ रसास्वाद भी जो कि परिणामी है, जिह्ा स…
- Verse 45यदि काठ, पत्थर आदि अशेष पदार्थ परमार्थ चिन्मय ही है, तो चिद्रूप काठ, पत्थर आदि का गृहरूप…
- Verses 46–49हे तत्त्ववेत्ताओं में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, इस विश्व को आप सन्मात्र ही समझिये। यह विश्…
- Verse 50जैसे कटक आदि बड़े भेदवाला सुवर्ण भेददृष्टि और भेददर्शन का त्याग करने पर एकमात्र निर्मल सु…
- Verse 51बोध की एकता से ही यह सृष्टि सद्रूप विश्व को असत् बनाती है अथवा असद् विश्व को सत् के सा…
- Verse 52जिस प्रकार तरंग आदि सब वस्तु एकमात्र जल ही हैं, काठकी बनी हुई पुतलियाँ एकमात्र काठ ही हैं…
- Verse 53घट आदि पदार्थों में अनुस्यूत सारभूत मिद्धीस्वरूप के तुल्य द्रष्टा आदि त्रिपुटी में अनुस्य…
- Verse 54उस ब्रह्म की त्रिपुटीशून्यता कब सिद्ध होती है ? इस पर कहते हैँ । चित्त के एक विषय से दूसर…
- Verse 55जाग्रत, स्वप्न ओर सुषुप्ति- इन तीन अवस्थाओं से रहित चित्तवृत्ति से शून्य जो आपका सनातन शु…
- Verse 56एक जडता का परित्याग कर जो कूटस्थ चिद्घनमात्र है, आप समाधिस्थ होकर अथवा व्यवहार करते हुए स…
- Verse 57यदि कोई कहे कि व्यवहार में रहने वाले की तन्मयता कैसे हो सकेगी 2 इस पर कहते है । इस संसार…
- Verse 58आत्मा किसी देह में न तो किसी की इच्छा करता है ओर न किसी से द्वेष करता है; इसलिए आप स्वस्थ…
- Verse 59जिस तरह अप्राप्त वस्तु में चित्त की अनासक्ति स्वतः सिद्ध है, उसी तरह वर्तमान वस्तु में भी…
- Verse 60जैसे दूर देश में स्थित मनुष्य रहता हुआ भी असत् के तुल्य है और जैसे काठ और पत्थर समीप में…
- Verse 61जैसे शिला में जल नहीं है, जैसे जल में अग्नि नहीं है, वैसे ही अपनी आत्मा में (जीवात्मा में…
- Verse 62जब चित्त असत् है, तो उसके कार्य युतरां असत्य हैं, ऐसा कहते हैं। विचार करके देखने पर जो क…
- Verse 63शुद्ध आत्मा का अशुद्धचित्त का अनुवर्तन भी अनुचित है, इस आशय से कहते हैं। अत्यन्त अनात्मभू…
- Verses 64–65हे श्रीरामचन्द्रजी, आप इस चित्त रूपी चण्डाल का निरन्तर दूर से ही निरादर करके मिटटी की बनी…
- Verses 66–67आत्मविचार करने से अथवा चित्त का विचार करने पर यह चित्त नहीं हे । आप वस्तुतः चित्तहीन है,…
- Verse 68इसलिए चित्त का दूर से ही परित्याग करके आप जो हैं, वही होकर स्थिर होइये और मननरूपी उत्तम य…
- Verse 69अधिकारियों के प्रोत्साहन के लिए मूढे की निन्दा करते है । जो मूर्खज्ञ असत्य चित्त का अनुवर…
- Verse 70तत्त्वज्ञान में कुशल होकर पहले व्यपगतमन यानी चित्तहीन होइये, तदनन्तर तत्त्वज्ञान से निर्म…