Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 54
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, verse 54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
देशाद्देशं गते चित्ते मध्ये यच्चेतसो वपुः ।
अजाड्यसंविन्मननं तन्मयो भव सर्वदा ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
उस ब्रह्म की त्रिपुटीशून्यता कब सिद्ध होती है ? इस पर कहते हैँ ।
चित्त के एक विषय से दूसरे विषय में जाने पर मध्य में जाञ्यस्फुरण से शून्य चेतन का जो
शुद्ध रूप है, उसमें आप तन्मय होइये