Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
तदात्मना तत्संबन्धे दृश्यत्वेनोपलभ्यते ।
सर्वं सर्वप्रकाराढ्यमनन्तमिव यत्नतः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि काठ, पत्थर आदि अशेष पदार्थ परमार्थ चिन्मय ही है, तो चिद्रूप काठ, पत्थर आदि
का गृहरूप से साथ सम्बन्ध कैसे देखा जाता है ? इस पर कहते हैं।
परमार्थरूप में कल्पित काठ, पत्थर आदि रूप से ही गृहादि पदार्थों के साथ उनका सम्बन्ध
देखा जाता है, न कि वास्तविक चिद्रूप से चूँकि अनन्त ब्रह्म ही सब प्रकारों से युक्त होकर सब
के तुल्य भासित होता है, इसलिए यह विश्व परमार्थमय ही है, इस तरह उत्तर श्लोक से इसका
अन्वय जानना चाहिए