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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

जतुकाष्ठादिसंबन्धो यः समासमयोगतः । नान्योन्यानुभवायासौ तदेकस्पन्दमात्रकम् ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

सत्‌ वस्तु के सम्बन्ध से वह वस्तु क्यो नहीं हैं ? इस पर कहते है । अत्यन्त असत्‌ अविद्या का सम्बन्ध सत्‌ आत्मा से उत्पन्न नहीं हो सकता, क्योकि परस्पर सदृशों का ही सम्बन्ध होता हे, यह अपने अनुभव से स्पष्ट है ॥३ ३॥ पार्थिवत्व तथा द्रवत्व से अत्यन्त विषम लाख और काठ आदि का जो परस्पर सम्बन्ध है, वह अत्यन्त असदृशो के परस्पर सम्बन्ध मेँ उदाहरण नहीं हो सकता, क्योंकि वे एक अविद्या के ही स्फुरणरूप हैं, अतः सदुश हैं, यह अर्थ है