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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verses 66–67

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, verses 66–67 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 66,67

संस्कृत श्लोक

प्रेक्षायामस्ति नो चित्तं तद्विहीनोऽसि तत्त्वतः । स किमर्थमनर्थेन तद्व्यर्थेन कदर्थ्यसे ॥ ६६ ॥ असता चित्तयक्षेण ये मुधा स्ववशे कृताः । तेषां पेलवबुद्धीनां चन्द्रादशनिरुत्थितः ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मविचार करने से अथवा चित्त का विचार करने पर यह चित्त नहीं हे । आप वस्तुतः चित्तहीन है, इसलिए आप एेसे अनर्थभूत व्यर्थ चित्त के साथ क्यों दुःखी होते हैं ? अत्यन्त असत्य चित्त रूपी यक्ष ने जिन लोगों को अपने वश में कर लिया है, उन सुकुमार मतिवालों के लिए चन्द्रमा से वज्र उत्पन्न हुआ है