Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 57
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, verse 57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
कस्यचित्किंचनापीह नोदेति न विलीयते ।
अक्षुब्धो वाथवाक्षुब्धः स्वस्थस्तिष्ठ यथासुखम् ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे कि व्यवहार में रहने वाले की तन्मयता कैसे हो सकेगी 2 इस पर कहते है ।
इस संसार में किसी का न तो कुछ उदित होता है ओर न लीन होता हे अर्थात् व्यावहारिक
वस्तु की सत्ता ही नहीं है इसलिए समाधिस्थ होकर या व्यवहार करते हुए स्वस्थ होकर
सुखपूर्वक स्थित होइये । व्यवहारदशा में भी परमार्थ दृष्टि का ही अनुवर्तन कीजिये, यह भाव
हे