Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verses 14–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, verses 14–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
असंभवश्च भवति स्वप्ने स्वमरणं यथा ।
असच्च सदिवाभाति स्वप्नेष्विव नभोगतिः ॥ १४ ॥
सुस्थितं सुष्ठ चलति भ्रमे भूपरिवर्तवत् ।
अचलं चलतामेति मदविक्षुब्धचित्तवत् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्न मे अपना मरण प्रतीत होता है, वैसे ही अत्यन्त असम्भव भी संभव
हो जाता हे । स्वप्न में आकाशगमन के तुल्य अत्यन्त असत् भी सत् सा प्रतीत होता है ।
चक्राकार घूमने पर पृथिवी के भ्रमण के तुल्य अत्यन्त स्थिर वस्तु भी चलने लगती है ओर
मदसे विक्षुब्ध चित्तवाले से देखी गई वस्तु के समान अचल वस्तु भी चंचलता को प्राप्त होती
है