Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 68
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, verse 68 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 68
संस्कृत श्लोक
चित्तं दूरे परित्यज्य योऽसि सोऽसि स्थिरो भव ।
भव भावनया मुक्तो युक्त्या परमयान्वितः ॥ ६८ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए चित्त का दूर से ही परित्याग करके आप जो हैं,
वही होकर स्थिर होइये और मननरूपी उत्तम युक्ति तथा ध्यान से युक्त होइये