Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
यदा चिन्मात्रसन्मात्रमयाः सव जगद्गताः ।
भावास्तदा विभान्त्येते मिथः स्वानुभवस्थितेः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
चित् के सम्बन्ध से पदार्थो का भान होता है, इस पक्षमे भी दोष कहते है ।
यदि जगत् के सभी पदार्थ चिन्मात्रमय-सन्मात्रमय हैं, तो वे स्वप्रकाशताके बल से ही
परस्पर प्रकाशित होते हैं । न कि किसी अन्य चेतन से जैसे दीपक को अपना प्रकाश करने के
लिए अन्य दीपक की अपेक्षा नहीं होती हे वैसे ही उनको भी अपने प्रकाश के लिए दूसरे चेतन
की अपेक्षा नहीं हैं