Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verses 28–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, verses 28–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
यथा बहूनां सदृशं वचनं नाम मानसम् ।
तथा स्वप्नेऽपि भवति कालो देशः क्रियापि च ॥ २८ ॥
व्यवहारगतेस्तस्याः सत्तास्ति प्रतिभासतः ।
सत्ता सर्वपदार्थानां नान्या संवेदनादृते ॥ २९ ॥
संवेदनेतरा भाति वीचिर्वा जलसंगतिः ।
भूतभव्यभविष्यस्था तरुबीजे तरुर्यथा ॥ ३० ॥
तस्याः सत्त्वमसत्त्वं च न सन्नासदिति स्थितम् ।
सत्सदेव हि संवित्तेरसंवित्तेरसन्मयम् ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रतिभा और प्रतिभा के विषय के संवाद में द्ृष्टान्त कहते हैं।
जैसे बहुत कवियों के मनों की उत्प्रेक्षा से रचित काव्य शब्द तथा अर्थ से समान होते हैं, वैसे
ही लवण और चाण्डालों के भ्रान्तिरूप स्वप्न में भी देश, काल और क्रिया भी समान हैं