Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
चिच्चेत्यमिलिता दृश्यरूपयोदेति चेतनः ।
जडं जडेन मिलितं घनं संपद्यते जडम् ।
न च चिज्जडयोरैक्यं वैलक्षण्यात्क्वचिद्भवेत् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
चिद्रूप से सदृश परमात्मरूप
वस्तु में चिन्मयरूप से सदुश जगत्रूप वस्तु अणुमात्र भी भेदक अचिद् वस्तु के अभाव से
अखण्ड स्वप्रकाशमात्र एकता को प्राप्त कर उसकी ही सामर्थ्य से अर्थात् एकत्व से ही अपनी
एकरूपता प्रकट करती है, अन्यथा नहीं ॥३ ८॥ ज्ञाता, ज्ञेय, ज्ञानरूप दृश्य त्रिपुटी के रूप से
चेतन ही उदित हुआ है, ऐसा जो मूढ़ों का अनुभव है, वह चित् और जड़ के अभेदसम्बन्ध से
नहीं बन सकता है, क्योंकि चित् ओर जड़ की एकता विलक्षणतावश कहीं हो ही नहीं
सकती