Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 70
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, verse 70 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 70
संस्कृत श्लोक
व्यपगलितमना महानुभावो भव भवपारगतो भवामलात्मा ।
सुचिरमपि विचारितं न लब्धं मलममलात्मनि मानसात्म किंचित् ॥ ७० ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञान में कुशल होकर पहले व्यपगतमन यानी चित्तहीन
होइये, तदनन्तर तत्त्वज्ञान से निर्मलात्मा होकर संसार से परे हो जाइये ।
इसी बात को दढ करने के लिए श्रीवसिष्ठजी विचारविशुद्ध अपना अनुभव कहते है ।
मैंने तत्त्वज्ञान के लिए बहुत काल तक मन का विचार किया तथापि निर्मल आत्मा में
मानसरूपी मल कुछ नहीं पाया । इसलिए मानसमल कोई वस्तु नहीं हैं | मेरे वाक्य से भी आप
स्वस्थचित्त होइये, यह अर्थ हे