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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 52

संस्कृत श्लोक

जलमेकं तरङ्गादि दार्वेकं शालभञ्जिका । मृन्मात्रमेकं कुम्भादि ब्रह्मैकं त्रिजगद्भ्रमः ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस प्रकार तरंग आदि सब वस्तु एकमात्र जल ही हैं, काठकी बनी हुई पुतलियाँ एकमात्र काठ ही हैं और घट आदि सब वस्तु मिट्टीमात्र है उसी प्रकार तीनों जगत्‌ का भ्रम एकमात्र ब्रह्म ही है