Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verses 6–7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, verses 6–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 6,7
संस्कृत श्लोक
तेषां समुचितैर्दानसन्मानैर्दुःखसंक्षयम् ।
कृत्वा करुणयाविष्टो इष्टलोकपरावरः ॥ ६ ॥
स्थित्वा तत्र चिरं कालं विमृश्य नियतेर्गतीः ।
आजगाम गृहं पौरैर्वन्दितः प्रविवेश ह ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
लोक में ऊच, नीच आदि विविध भावों को
देख चुके राजा लवण दया से पूर्ण हो गये, उन्होने समुचित दानसम्मान से उन भीलों के
दुःख का निवारण किया । वहौँ चिरकाल तक निवास कर तथा दैव की गति का विचार कर
घर लौटे ओर पुरवासियों से वन्दित होते हुए उन्होने घर में प्रवेश किया