Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
लावणी प्रतिभाऽऽरूढा विन्ध्यापुष्कसचेतसि ।
विन्ध्यपुष्कससंविद्वाऽऽरूढा पार्थिवचेतसि ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रतिभा के भेद की कल्पना भी विचारसह नहीं है, क्योकि एक में उत्पन्न हुई प्रतिभा का दो
में भान हो सकता है, इस आशय से कहते हैं।
राजा लवण की प्रतिभा विन्ध्यपर्वत के चण्डालों के हृदय मेँ आरूढ हुई थी, अथवा
विन्ध्यपर्वत के चण्डालों की प्रतिभा राजा लवण के चित्त में आरूढ़ हुई थी