Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verses 46–49
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, verses 46–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 46-49
संस्कृत श्लोक
विश्वं सन्मात्रमेवैतद्विद्धि तत्त्वविदां वर ।
असत्तात्यागनिष्ठेन विश्वं लक्षशतभ्रमैः ॥ ४६ ॥
पूरितं चिच्चमत्कारो नच किंचन पूरितम् ।
संकल्पनागरा नॄणां मिथः स्पन्दन्ति नो यथा ॥ ४७ ॥
न देशकालरोधाय तथा सर्गेष्विति स्थितिः ।
भेदबोधे हि सर्गत्वमहंत्वादिभ्रमोदयः ॥ ४८ ॥
हेमसंवित्परित्यागे कटकादिभ्रमो यथा ।
कटकादिभ्रमो हेम्नि देशाद्देशं भवाद्भवम् ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे तत्त्ववेत्ताओं में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, इस विश्व को आप
सन्मात्र ही समझिये। यह विश्व मिथ्यात्वग्रहणरूप चित् के चमत्कार द्वारा सैंकड़ों, लाखों भ्रमों
से पूर्ण हैं वह चित् का चमत्कार परमार्थतः किसीसे पूर्ण नहीं है | जैसे मनुष्यों के संकल्प से
नगर में निवास करनेवाले जन देश और काल के अवरोध के लिए परस्पर चेष्टा नहीं करते वैसे
ही सृष्टि को भी अवस्थित जानिये । भेद का बोध होने पर ही सृष्टि तथा अहन्त्व आदि भ्रम का
उदय होता है। जैसे सुवर्णज्ञान का परित्याग करने पर कटक आदि का भ्रम होता हे सुवर्ण में
कटक आदि का भ्रम भिथ्या ही है, क्योंकि वे सुवर्ण के ही देश से देश तथा सुवर्ण की सत्ता से
ही सत्ता प्राप्त करते हैं