Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 121, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 121 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
चिज्जडौ चित्र एकत्र न तौ संमिलतः क्वचित् ।
चिन्मयत्वाच्चिदालम्भश्चिदालम्भेन वेदनम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
चित् और जड़ के भेदसम्बन्ध से भी उक्त अनुभव उत्पन्न नहीं हो सकता, इस आशय से
कहते हैं।
एक त्रिपुटीरूप चित्र मेँ चित् ओर जड़ दोनों भेदसम्बन्ध से भी कभी नहीं मिल सकते |
चिन्मय पदार्थों का चित् के साथ सम्बन्ध हो सकता है इस पक्ष को लेकर भी उक्त अनुभव
उत्पन्न नहीं हो सकता, यह कहते हैं।
चिन्मयत्वरूप सादृश्य से यद्यपि चित् की उपलब्धि होती है, तथापि चित् की उपलब्धि
होने पर भी चिद्रूप वेदनांशकी ही उपलब्धि हुई न कि वेद्याश की, क्योंकि भेदक अचिद् वस्तु
के अभाव से वेद्यत्वरूप की सिद्धि असम्भव है । अतएव वेद्य ओर वेदन दोनों अंशो की उपपत्ति
नहीं होती है, यह अर्थ है