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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 87

छियासीवाँ सर्ग समाप्त सत्तासीवों सर्ग देह, इन्द्रिय आदि की उत्पत्ति के क्रम से अपनी देह में ही विश्व की कल्पना तथा अपनी स्वय॑भूरूपता का श्रीवसिष्ठजी के द्वारा वर्णन।

68 verse-groups

  1. Verses 1–2जै मेने ध्यानपूर्ण द्रष्ट से शिला, वृक्ष, तृण आदि समस्त पदार्थो मे कृष्टयो देखी थी वैते ह…
  2. Verse 3जैसे बीज में भीतर विद्यमान अंकुर सींचने से विकसित होकर ऊपर की ओर निकल आता है वैसे ही मूर्…
  3. Verses 4–5अपनी समाधि में उच्च सृष्टि का आपने कैसे अनुभव किया 2 इस्र प्रश्न पर कहते हैं / जैसे सुषुप…
  4. Verse 6हदि चगोदयः इससे आपने (हृदय) पद से हृदयाकाश कहा है ओर आकाशरूपत: ' इससे मैने आपका अभिप्राय…
  5. Verse 7श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा पूछे गये मतनब को विस्तार के साथ कहने के लिए श्रीवश्तिष्ठजी प्रत…
  6. Verse 8उस सुवर्णशिला आदि में महाकल्प के संगम को देखकर चिदाकाशस्वरूप मैंने शरीर के अन्य भाग में स…
  7. Verse 9पहले (तस्माद्रा एतस्मादात्मन आकाशः सभ्रूतः ' इस शति में प्रतिपादित करम जिसका उपलक्षण है ऐ…
  8. Verse 10यह आकाशतः विद्घन के भीतरी शून्यश्रावग्राप्तिरूय सृक्ष्मता आधिक्य न था, किन्तु वित्‌ की चक…
  9. Verse 11दिङ्मात्र (७) आकाश ही सर्वप्रथम चिन्तन करने से चित्त होता है । तदनन्तर “मैं आकाश हूँ” ऐसा…
  10. Verse 12वही इस तरह विषयों की कल्पना करने के अनन्तर उनकी ग्राहक इन्द्रियों की भी कल्पना करते है यह…
  11. Verse 13इन्हीं विषयों तथा इन्द्रियों के कारण ही पहले दु-खरहित रहनेवाले आत्मा को स्वप्न की तरह व्य…
  12. Verse 14स्वप्न में आकाशादि क्रम से सृष्टि नहीं होती, किन्तु एक ही समय मे सहसा सम्पूर्ण जयत्‌ का अ…
  13. Verse 15क्षण के अन्दर दीर्घकाल की कल्पना के समान सुन्दर परमाणु के अन्दर भी दीर्घं देश की कल्पना स…
  14. Verse 16जैसे वायु का सवालनस्वभाव हे वैसे ही शरीर आदि की कल्पना करना मनका स्वभाव हैं, यह कहते हैं…
  15. Verse 17प्राथमिक मनकी कल्पनारूप उस परम शक्ति ने संसार के रूप आदि की जैसी कल्पना की है उसे स्वयं ब…
  16. Verse 18यही कारण है कि उसके बाद मैं अपरिच्छिन्नस्वरूप रहने पर भी उसके द्वारा की गई परिच्छेद की कल…
  17. Verse 19उसके बाद चिति के प्रतिबिम्ब की व्याप्ति से तेज के कण की तरह आकृतिवाले सूक्ष्म लिंग शरीर क…
  18. Verse 20उसके पश्चात्‌ 'मैं कुछ देखू" इस साधारण बोधसे जब कुछ देखने के लिए प्रवृत्त हुआ, तो मुझे अन…
  19. Verse 21हे रघुवंशियों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, यहाँ जो कुछ नाम सुनाई पड़ता है वस्तुतः वह उस च…
  20. Verse 22जिस छिद्र से मैं देखने के लिए प्रवृत्त हुआ, वह नेत्र कहलाता है, जिसे मैं देखता हूँ, वह दृ…
  21. Verse 23जब मैं देखता हूँ, वह काल है, जैसे देखता हूँ, वह क्रम है और जहाँ मैं देखता हूँ, वह आकाश है…
  22. Verse 24जिस जगह मैं स्थित हूँ, वह देश कहलाता है, यह मेरी आज की कल्पना है । यह आप मुझसे पूछ सकते ह…
  23. Verse 25देह में चक्षु आदि छिद्रों की कल्पना आदि के दर्शन आदि जनित कौतुक के वाद वहाँ पर भे देख, ऐस…
  24. Verse 26जिन दो छिद्रों से मैंने देखा वे दोनों ये मेरे नेत्र स्थित हैं । इसके बाद "में कुछ सुरू" य…
  25. Verse 27तत्पश्चात मैंने वहाँ पर कुछ थोड़ा-सा एक झंकार सुना । वह जोरसे पके गये शंख के शब्द-जैसा आक…
  26. Verse 28मैंने जिन दो छिद्र प्रदेशों द्वारा संचरणशील वायु की सहायता से (70) बहुत दूर तक फैले हुए श…
  27. Verse 29तदनन्तर जिस प्रदेश से मैंने वहाँ जो कुछ थोड़ा-बहुत स्पर्शं संवेदन का अनुभव किया, उसको त्व…
  28. Verse 30जिससे छुए हुए-से तत्‌-तत्‌ अंगों का मैंने अनुभव किया, वह एकमात्र सत्यसंकल्पस्वरूप पवन कहा…
  29. Verse 31इस रीति से अनुभव करनेवाले मुझमें स्पर्श -इन्द्रिय तन्मात्रा की सिद्धि हुई | और मुझमें रसा…
  30. Verse 32प्राण के संकल्प से आकृष्ट प्राणवायु के भेदरूप अपान से प्राणेन्द्रिय और तन्मात्रा उत्पन्न…
  31. Verses 33–34तदनन्तर पवो इन्द्रियों की भोयवृत्ति मुझनें जबरदस्ती उदिति हो यह; यह कहते हैं / हे श्रीराम…
  32. Verse 35इस तरह देह, इन्द्रिय तथा विषय की भावना करता हुआ यानी उनका अभिमानी होता हुआ मैं स्थित हुआ…
  33. Verse 36दृढ़ अध्यवसाय से विशेष बढ़कर यही अहंकार “बुद्धि' इस नाम से पुकारा जाता है और बाद में जब य…
  34. Verse 37इस तरह वस्तुतः (0)) श्रोत्रादि का व्यापार भी प्राण के अधीन है, यह दिखलाने के लिए “विचरता…
  35. Verse 38चूँकि पवन से भी सूक्ष्म केवल आकाशमात्र शून्य-स्वरूप मैं आकृतिशून्य ही हूँ, इसीलिए सभी कल्…
  36. Verse 39इस प्रकार उस पूर्वकल्पित ब्रह्मात्मक देह में भावना करके जब मैं चिरकाल तक स्थिर रहा, उस सम…
  37. Verse 40वैसी वृत्ति होने से स्वप्न में उड़कर आकाश में संचरण कर रहा सुप्त मनुष्य जैसे शब्द करता है…
  38. Verse 41विशेष शब्द का अभिलाय करने में कोड विनियमक न होने के कारण स्र्वत्नाधारण अर्थवाले शब्दसमष्ट…
  39. Verse 42इसके पश्चात्‌ स्वप्नावस्था में स्थित मनुष्य के शब्द के समान पूर्व कल्प में अभ्यस्त व्याहत…
  40. Verse 43इस तरह सृष्टि का कर्ता जगदगुरु मैं ब्रह्मा ही हो गया और इसके अनन्तर ब्रह्म शरीर को, जो कि…
  41. Verse 44इस तरह मैं ब्रह्मरूप से समुत्पन्न हूँ, मैंने किसी दूसरी वस्तु के रूप में जन्म नहीं लिया ह…
  42. Verse 45इस प्रकार मेरे इस मनोमय जगत्‌ के सम्पन्न हो जाने पर भी वास्तव में कुछ भी सम्पन्न नहीं हुआ…
  43. Verse 46यही न्याय सारी सृष्टियों में जानना चाहिये, इस आशय से कहते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्…
  44. Verse 47हे श्रीरामचन्द्रजी, ज्ञानस्वरूप परमात्मा में ज्ञान ही जगतरूप मृगतृष्णा जल भासते हैं । यह…
  45. Verse 48मरुस्थल में जल बिलकुल नहीं है, किन्तु बिना कारण के ही अन्तःकरण से क्षुब्ध हो अपने में संभ…
  46. Verse 49इसी तरह ब्रह्म मे जगत्‌ नहीं है, यह बिल्कुल सही है, फिर भी बिना कारण के ही अज्ञानावृत संव…
  47. Verse 50हे श्रीरामचन्द्रजी, असद्रूप ही यह जगत्‌ अन्तःकरण में ही ऐसे व्याप्त है, जैसे संकल्पप्रयुक…
  48. Verses 51–52जैसे समीप में सोये हुए मनुष्य के स्वप्नका उसके (स्वप्नद्रष्टा के) चित्त में प्रवेश किये ब…
  49. Verse 53यदि आप आधिभौतिक भावमय नेत्र से देखना चाहें, तो वे शिलापर्यन्त तत्‌-तत्‌ ब्रह्माण्ड आपको त…
  50. Verse 54आतिवाहिक देह से यदि परमबोधदृष्टि से देखा जाय, तो वह सृष्टि निर्मल परमात्मस्वरूप ही योगियो…
  51. Verse 55तत्त्वदृष्टि से यदि देखा जाय, तो सृष्टि का निर्वाण एकमात्र ब्रह्मस्वरूप ही सर्वत्र दिखाई…
  52. Verse 56तत्वद्रष्टि ओर योगी की दष्ट की सवोत्कृष्ट रूप से प्रशसा करते है / शुद्ध बुद्धि उपपत्ति तथ…
  53. Verse 57वहाँ जीवन्मुक्त योगियों की द्रष्ट से देख रहे स्वयं तत््वज्ञानी श्रीकसिष्ठजी को जब आकाश की…
  54. Verse 58जैसे चक्रवर्ती राजा केवल स्वदेह में अहंभाव का त्याग न करता हुआ ही समस्त भूमण्डल के ऊपर मम…
  55. Verse 59तदनन्तर हे श्रीरामचन्द्रजी, उस पृथिवी की धारणा से पृथिवी के अभिमानी जीव की स्वरूपता प्राप…
  56. Verse 60जो श्रीवश्तिष्ठजी ने अनुभव किया, उसका वे वर्णन करते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, तब मैं विवि…
  57. Verse 61मैं अनेक गाँव गुफारूपी पर्वा से परिपूर्ण, पातालबिलरूपी उदर से युक्त, सात कुलपर्वतरूपी भुज…
  58. Verse 62भूषीठ रूप मैं दिग्गजों के मस्तक समूहों तथा शेषनाग के हजार सिरों से थामा गया, तृणों के समु…
  59. Verse 63सेनासमूहरूपी तन्तुओं की गाँठ-जैसे जिनके हाथी खूब सुशोभित हो रहे थे, ऐसे अनेक राजे परस्पर…
  60. Verse 64हिमालय तथा विन्ध्याचल मेरे सुन्दर कन्धे थे, सुमेरु पर्वत ऊँची गर्दन था, गंगा, यमुना आदि न…
  61. Verse 65गुहाओं से गहन कछार आदि देशों तथा आदर्श-मण्डल जैसे अनेक सागरो से मैं परिपूर्णं हो गया ओर म…
  62. Verse 66पहले पैदा हो चुके महासागरों से प्रलयकाल में बिलकुल परिपूर्ण, परन्तु इस समय तो स्नानकर ऊपर…
  63. Verse 67किसान सब मेरे ऊपर प्रतिदिन हल जोतने लग गये ओर शीतल पवन पंखा डुलाने लगे । मैं सूर्य की तीक…
  64. Verse 68विशाल, सम भूप्रदेशरूपी वक्षःस्थल से अलंकृत, पद्माकाररूपी नेत्रो से भूषित, सफेद और काले मे…
  65. Verse 69मैं लोकालोक पर्वत के समीप में स्थित, जिसका मैंने आपसे पहले वर्णन किया है, महाखातवलयरूप ()…
  66. Verse 70विशाल खण्दक के मण्डपरूप अनेकविध पृथक्‌-पृथक्‌ भूत समूहरूपी कीड़ों से बाहर तथा भीतर से मैं…
  67. Verse 71भूतलरूप मैं पातालरूपी इन्द्रियछिद्रों में नागों तथा असुररूपी कृमिसमूहों से एवं सात समुद्र…
  68. Verse 72(८) यहाँ से शुरू करके इस सर्ग के अन्ततक देहाधार से भूपीठ का ही वर्णन करते हैं । (&) यहाँ…