Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
अथैवंभावनाच्चाहं यदा तत्र चिरं स्थितः ।
तदाहं देहवान्दृष्ट इति मे प्रत्ययोऽभवत् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार उस पूर्वकल्पित
ब्रह्मात्मक देह में भावना करके जब मैं चिरकाल तक स्थिर रहा, उस समय मुझे यह प्रतीति हुई कि
मैंने स्वयं अपने को ही चतुर्मुख देहवान् देखा है अर्थात् चतुर्मुख देहधारी मैं ही हूँ, ऐसी वृत्ति मुझमें
उस समय उदित हुई