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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

एष एव घनीभूतो बुद्धिरित्यभिधीयते । साथ बुद्धिर्घनीभूता मन इत्यभिधीयते ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

दृढ़ अध्यवसाय से विशेष बढ़कर यही अहंकार “बुद्धि' इस नाम से पुकारा जाता है और बाद में जब यह बुद्धि घनीभूत हो जाती है तब यह "मन" इस नामसे कही जाती है हे श्रीरामचन्द्रजी, यह भी आपको जान लेना चाहिये कि वही मन पुनः पुनः विषयों का चिन्तन करने से "चित्त" रूप में सम्पन्न हो जाता है