Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
यादृशं चेतितं रूपं शक्त्या परमया तया ।
तच्छक्नोत्यन्यथाकर्तुं नैषा यत्नेन भूयसा ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राथमिक मनकी कल्पनारूप उस परम शक्ति ने
संसार के रूप आदि की जैसी कल्पना की है उसे स्वयं बड़े प्रयत्न से भी यह बदल नहीं सकती ।
कहने का तात्पर्य यह कि उत्तर कल्पनाओं में वही स्थिर नियति बनी रही