Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 70
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verse 70 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 70
संस्कृत श्लोक
व्याप्तमन्तर्बहिश्चैव नानाभूतगणैः पृथक् ।
देवदानवगन्धर्वैर्बहिरन्तस्तु कीटकैः ॥ ७० ॥
हिन्दी अर्थ
विशाल खण्दक के
मण्डपरूप अनेकविध पृथक्-पृथक् भूत समूहरूपी कीड़ों से बाहर तथा भीतर से मैं व्याप्त हो गया
अर्थात् उन प्राणियों में जो देव, दानव तथा गन्धर्व थे, उनसे तो मैं व्याप्त हो गया । मेरे कहने का
तात्पर्य यह कि भूतलरूप मुझमें बाहर तथा भीतर से अनेक तरह के प्राणियों का समुदाय ठसा-ठस
भर गया