Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 60
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verse 60 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
संपन्नोऽस्म्यथ भूपीठे नानावनतनूरुहम् ।
नानारत्नावलीव्याप्तॆ नानानगरभूषणम् ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
जो श्रीवश्तिष्ठजी ने अनुभव किया, उसका वे वर्णन करते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, तब मैं विविध प्रकार के वन तथा वृक्षरूपी रोमों से परिपूर्ण, अनेक तरह की
रत्नावलियों से व्याप्त तथा अनेक तरह के नगररूपी आभूषणं से सुशोभित भूतलस्वरूप हो
गया (८)