Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
इत्थं संशून्यमेवेदं सर्वं वेदनमात्रकम् ।
मनागपि न सन्त्येते भावाः पृथ्व्यादयः किल ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
यही न्याय सारी सृष्टियों में जानना चाहिये, इस आशय से कहते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार यानी मेरी इस सृष्टि के समान ही यह सब वेदनामात्र शून्य
ही है। ये पृथिवी आदि भावपदार्थ तनिक भी नहीं है, यह बिल्कुल निश्चित है